Wednesday, May 13, 2015

शराबी

शहर ये अब खाली खाली ना लगे तो क्या करे
लोग तो सब भर्ती हो गए हस्पतालों में...

सकल सूरत तो अच्छे भले इंसान की लगती है
जाने कौन-2 छुपा बैठा है रंग बिरंगी खालों में...

वो सहंशाह-ऐ-ताज जिसके पास माँ नहीं है
गिन ही लूँ मैं उसे भी शहर के कंगालों में...

मेरी सलाह है मुझे हल्के में मत ले मेरे दुश्मन
जिंदगी मेरी गुजरी है तूफानों में भुचालों में...

तकलीफ चांदनी देने लगे और मरहम करने लगे अँधेरा
तो फिर कौन जाना चाहेगा अंधियारों से उजालों में...

हसीं लम्हे हैं रंगीन वादियां दिल बेचैन
आओ फूल लगा दूँ बालों में...

चले आओ तुम प्यार करो मैं भी तो देखूं
कौन रोकता है तुम्हें आने से मेरे खयालों में...

शराबी नहीं हैं हम बस गम भुलाने को
लगा लेते हैं कभी कभी इक्का दुक्का सालों में...

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