वो सख्स जो दिन रात दिल पे चोट करता था ...
वो सख्स मुझे आज फ़कीर सा लगा ...
जिसके बोलने भर से मुंह से फूल झड़ते थे ...
आज मुझे बोल उसका तीर सा लगा ...
भले वो कह रहे हों खास नहीं ये मामूली सी बात है ...
पर मामला मुझे ये कुछ गम्भीर सा लगा ...
वो जिसने सर पे हाथ रखके 'जीते रहो' बोला ...
वो बूढ़ा आदमी मुझे अपने पीर सा लगा ...
जब मर्जी अपनी कहीं चली ही नहीं तो ...
मुझे शरीर अपना किसी कि जागीर सा लगा ...
उसे देखे बिना जब दो पल भी नहीं कटे ...
तो मुझे दिल अपना उसके वजीर सा लगा ...
और हमसफ़र जब सफ़र के बीच छोड़ गया ...
तो बाप का घर मुझे मंदिर सा लगा ...
वो सख्स मुझे आज फ़कीर सा लगा ...
जिसके बोलने भर से मुंह से फूल झड़ते थे ...
आज मुझे बोल उसका तीर सा लगा ...
भले वो कह रहे हों खास नहीं ये मामूली सी बात है ...
पर मामला मुझे ये कुछ गम्भीर सा लगा ...
वो जिसने सर पे हाथ रखके 'जीते रहो' बोला ...
वो बूढ़ा आदमी मुझे अपने पीर सा लगा ...
जब मर्जी अपनी कहीं चली ही नहीं तो ...
मुझे शरीर अपना किसी कि जागीर सा लगा ...
उसे देखे बिना जब दो पल भी नहीं कटे ...
तो मुझे दिल अपना उसके वजीर सा लगा ...
और हमसफ़र जब सफ़र के बीच छोड़ गया ...
तो बाप का घर मुझे मंदिर सा लगा ...
No comments:
Post a Comment