जिंदगी की दौड़ में मैं जरा सा ठहरके
पीछे मुड़के तुझे जो देखूं देखता रहूँ
घाव दिल के जो रिसते रहे हैं रातों को
तेरी तस्वीर के फावों से सेकता रहूँ
दिल चाहता है छांट लूँ हसीं हसीं लम्हे
और जो हों दर्ददाई उन्हें फेंकता रहूँ
मैं तेरे रंग रूप और सूरत को रात भर
भले कलम टूट जाये मगर लिखता रहूँ
हर अदा पे सो सो बार निकले है दम
कहाँ से तुझे शुरू करूँ कहाँ पे खत्म
कितनी भी रख लो तुम चेहरे पे हथेलियाँ
आँखें आज भी करती हैं तेरी वोही अटखेलियां
हर नजर तुझपे आके ठहर जाती होगी
जलके खाक हो जाती होंगी तेरी ही सहेलियां
आज भी तेरी जुल्फें दिन को रात करती हैं
भले तुम चुप बैठे रहो आँखें बात करती हैं
मेरा सब कुछ लूट के तेरी ये कलमुही नजरें
मुझे दुनिया की इस भीड़ में अनाथ करती हैं
नरम होठों पे है सुबह के सूरज की लाली
छरहरा बदन है जैसे चन्दन की डाली
कौन कलम से लिखी गई है किस्मत उस हकीर की
खुदा का जो भी बन्दा है इस बाग़ का माली...
पीछे मुड़के तुझे जो देखूं देखता रहूँ
घाव दिल के जो रिसते रहे हैं रातों को
तेरी तस्वीर के फावों से सेकता रहूँ
दिल चाहता है छांट लूँ हसीं हसीं लम्हे
और जो हों दर्ददाई उन्हें फेंकता रहूँ
मैं तेरे रंग रूप और सूरत को रात भर
भले कलम टूट जाये मगर लिखता रहूँ
हर अदा पे सो सो बार निकले है दम
कहाँ से तुझे शुरू करूँ कहाँ पे खत्म
कितनी भी रख लो तुम चेहरे पे हथेलियाँ
आँखें आज भी करती हैं तेरी वोही अटखेलियां
हर नजर तुझपे आके ठहर जाती होगी
जलके खाक हो जाती होंगी तेरी ही सहेलियां
आज भी तेरी जुल्फें दिन को रात करती हैं
भले तुम चुप बैठे रहो आँखें बात करती हैं
मेरा सब कुछ लूट के तेरी ये कलमुही नजरें
मुझे दुनिया की इस भीड़ में अनाथ करती हैं
नरम होठों पे है सुबह के सूरज की लाली
छरहरा बदन है जैसे चन्दन की डाली
कौन कलम से लिखी गई है किस्मत उस हकीर की
खुदा का जो भी बन्दा है इस बाग़ का माली...
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