Sunday, January 18, 2015

लिखता हूँ

किसी ने मुझसे पूछा "क्या करते हो ?"
मैंने कहा " लिखता हूँ "
उसने पूछा "क्या लिखते हो ?"
मैंने कहा :----

वो जो बेहोश हैं नशे में जवानी में और इश्क़ में
उनके लिए मैं अपनी कलम से होश लिखता हूँ

वो जो हार चुके हैं हिम्मत, खो चुके सारी उम्मीदें
उनके लिए मैं जीने का नया जोश लिखता हूँ

वो जो जल्लाद हैं जो पीते हैं खून गरीबों का
उनको मैं अपनी लिखाई में खानाबदोश लिखता हूँ

यूँ ना सोचे कोई के लिखावट में नरमी है बहुत
उतना ही शोर मचाती हैं जितना खामोश लिखता हूँ

जरा भी फर्क नहीं करती मेरी कलम राजा और रंक में
जो दोषी होता है मैं उसी का दोष लिखता हूँ

नाचने लगती हैं मेरे साथ ज़माने भर की दुविधाएं
जब खोके होशो हवास होके मदहोश लिखता हूँ

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