Tuesday, February 3, 2015

फ़कीर

धुआं सा लग गया है हर सांस को जैसे
यूँ ही खिंचा खिंचा सा पूरा शरीर रहता है

हर कदम रुकूँ मैं , सोचूं मैं ,जाना है कहाँ
आजकल मेरे अंदर एक हकीर रहता है

आज तू नहीं , तेरा साथ नहीं ,सौगात नहीं
सड़कों पे सना धुल में एक फ़कीर रहता है

शायद के बरसात हो वीराने बंजर दिल पे
इसी चाह में भटकता कोई राहगीर रहता है

दहलीज पर ना जाने कब हुस्न दस्तक दे
इसी ताक़ में खड़ा पूरा दिन वजीर रहता है

बहुत पुराना साथी बहुत दूर चला गया है
नयनों में अब जरा जरा सा नीर रहता है

ठोकरें बहुत लगी मगर गिरते गिरते बचा हूँ
मेरे साथ हर वक़्त मेरा पीर रहता है

इश्क़ ने इस सहर में तबाही मचा रखी है
हर गली हर कूचे पर एक कबीर रहता है...

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