Sunday, September 14, 2014

सोफे हैं , कालीन है , झुमका है , झूमर है …

सोफे हैं , कालीन है , झुमका है , झूमर है …
मगर घर जैसा तेरे घर में कुछ भी नहीं है  …

मेरे घर में प्यार है ,  वफ़ा है , दुलार है …
अफ़सोस ये सब तेरी नज़र में कुछ भी नहीं है …

मेरा दिल बाजार है ,सुकून , ख़ुशी और ख़ाबों का …
तेरे लायक मेरे बाज़ार सदर में कुछ भी नहीं है …

मैंने माना हैं लाख खामियां तेरे अंदर साजन मेरे …
फिर भी तू नहीं तो मेरे सफर में कुछ भी नहीं है …

सोफे हैं , कालीन है , झुमका है , झूमर है …
मगर घर जैसा तेरे घर में कुछ भी नहीं है  …

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