Tuesday, November 11, 2014

तराजू

इक दौर में मेरे हाथों एक खूबसूरत सा दिल टूट गया था ...
ज़िन्दगी की भाग-दौड़ में एक अच्छा साथी छूट गया था ...

अपने अपने हाल पर हमने इक दूजे को छोड़ दिया ...
खेल खेल में हमने उस दिन हर एक नाता तोड़ लिया ...

निकल पड़े फिर दोनों पंछी अपने अपने रास्ते...
किसने किसको दर्द दिया ना जाने किसके वास्ते ...

मोहब्बतों की राहों में कोई उसे मिला कोई मुझे मिला ...
ना उस जैसा कोई मुझे मिला ना मुझ जैसा कोई उसे मिला  ...

फैसला जो गलत किया था , ये तो आखिर होना ही था ...
मैंने रुलाया किसी को , मुझको तो फिर रोना ही था ...

मुझ जैसे कुसूरवार को माफ़ी नहीं दिया करते ...
जो जान लूटने वाले हों वो लम्बा नहीं जिया करते ...
आज अपना दिल टूटा तो बात समझ में आई ...
तराजू खुदाओं के कभी ना-इंसाफी नहीं किया करते ...

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