Wednesday, November 12, 2014

दीवार


अच्छा हो के दिलों में फिर से प्यार आ जाए ...
इससे पहले की आँगन में दीवार आ जाए ...

माथे से अपनी कीमत की पर्ची हटा लूँ मैं ...
इससे पहले के मेरे घर में बाजार आ जाए ...

खुदा करे किसी रोज मैं घर से गुस्से में निकलूं ...
और सामने से कोई गद्दार आ जाए ...

काश के मोहब्बत के नसीब में ऐसा होता ...
जो साथ है इस पार वो उस पार आ जाए ...

गरीब झोंपड़ी मेरी महल सी चमक उठे ...
ठहरने इसमें कभी अगर मेरा यार आ जाए ...

बेहतर हो तू रास्ते पर आ जाए दोस्त मेरे ...
इससे पहले के हाथ में हथियार आ जाए ...

गर पास से तू गुजर जाए खुशबू बिखेरती ...
खुदा कसम रूखे चेहरों पर निखार आ जाए ...

वो बना रहा हो जोड़े ईश्क और हुस्न के...
खुदा करे तेरे हिस्से ये गंवार आ जाए...

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